टूटे रिश्‍ते की ‘कैद’!

 हमने लड़कियों के लिए सगाई, शादी को इतना जरूरी बना दिया है कि वह जिंदगी से कहीं आगे की बात हो गई है. मिडिल क्‍लास अभी तक इसी सिंड्रोम में है कि ‘किसी कीमत पर शादी हो जाए, बस! वह इसके लिए हर समझौते को तैयार है.’

वह बहुत ही खुशमिजाज, जिंदादिल छात्रा थीं. हम सब एक ही कॉलेज से थे. आगे चलकर जिंदगी की गलियों में कुछ ऐसे घूमे कि कौन कहां गया, बहुत दिनों तक हिसाब नहीं मिला. एक दिन अचानक एक विवाह समारोह में उनसे मिलना हुआ. वह अपने भाई के साथ थीं. दोनों ही समान रूप से मेरे मित्र रहे हैं. इसलिए, दोनों से सप्रेम मिलना हुआ. सब ठीक रहा. बस यही महसूस हुआ कि आभा दुबे बहुत बदल गई हैं. उनके भाई अभय ने बताया कि सात साल पहले शादी टूटने के बाद से वह अपनी ही कैद में ‘नजरबंद’ हैं.


यह शादी इसलिए टूटी, क्‍योंकि लड़के वालों की कुछ ऐसी मांग थी, जिसे मानने से आभा ने इंकार कर दिया. जैसे एक ही शहर में रहने के बाद भी उनसे कहा गया कि नौकरी नहीं करनी है.
अगर काम करने का बहुत मन है तो लड़के के साथ उसके बिजनेस में कोई काम खोज लें. आभा इंजीनियर हैं. उन्‍हें टेक्‍सटाइल के बिजनेस में अपनी रुचि का काम नहीं दिखा. इससे भी बढ़कर यह कि आभा की जिनसे सगाई हुई, वह दिल्‍ली के सेंट स्‍टीफेंस के छात्र होने के बाद भी पत्‍नी के काम करने के पक्ष में नहीं दिखे! पहले इस बात को टाला गया, लेकिन सगाई के तुरंत बाद इसे स्‍पष्‍ट कर दिया गया.
आभा को आशा थी कि इस फैसले में उनकी शिक्षित मां, भाभी साथ देंगी, लेकिन एकदम उल्‍टा हुआ. कोई उनके पक्ष में नहीं आया. पिता, भाई ने कुछ साथ निभाया, लेकिन पिता समाज और भाई पत्‍नी के पक्ष में चले गए.


हमने लड़कियों के लिए सगाई, शादी को इतना जरूरी बना दिया है कि वह जिंदगी से कहीं आगे की बात हो गई है. मिडिल क्‍लास अभी तक इसी सिंड्रोम में है कि ‘किसी कीमत पर शादी हो जाए, बस!’
यह सोच समाज में लड़कियों, महिलाओं के बारे में आए बड़े बदलाव के बाद भी नहीं बदली है. मन में कहीं न कहीं यह विचार धंसा हुआ है कि लड़कियों की शादी प्रतिष्‍ठा का विषय है. इस बात को सरलता से ऐसे भी समझ सकते हैं कि अगर भाई, बहन दोनों तीस के हो गए हैं, तो भी प्रतिष्‍ठा की सारी जिम्‍मेदारी ‘बेटी’ पर ही टिकी है.


हम एक स्‍वतंत्र, सक्षम बेटी के लिए दिन-रात ख्‍वाब बुनते रहते हैं, लेकिन जैसे ही ‘ऐसी’ बहू मिलने को होती है, हमारा हौसला टूटने लगता है. मन में आशंका के बवंडर उठने लगते हैं. रिश्‍तों की नाव डगमगाने लगती है!
आभा सक्षम, स्‍वतंत्र हैं. उन्‍हें किसी सहारे की जरूरत नहीं. इसलिए उन्‍हें तो ऐसे अधकचरे रिश्‍ते में धंसने की खुशी होनी चाहिए थी, लेकिन किसी और ने नहीं, बल्कि उनके परिवार से मिलने वाले ताने, समर्थन की कमी ने उनके भीतर निराशा भरने का काम किया. जो दूसरों को उजाला देने का काम चुपचाप करती थी, खुद निराशा के भंवर में डूबती-उतराती रहती हैं.
आपको अगर अपने आसपास ऐसी ‘आभा’ दिखें, मिलें तो उन्‍हें साथ, हौसला दीजिए! अपने बच्‍चे के लिए जैसी दुनिया चाहते हैं, उसकी नींव में कुछ पत्‍थर तो ‘वैसे’ रखने ही होंगे!

साभार-दयाशंकर मिश्र-ज़ी न्यूज़

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