कैसे साइलेंट किलर बन रहा है हार्ट अटैक ?/ Can You Die From A Silent Heart Attack ?

कुछ साल पहले तक हम हार्ट अटैक और कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों के बारे में बहुत कम सुनते थे। लेकिन मौजूदा दौर में छोटी और बड़ी उम्र के लोग बड़ी तादाद में इन जानलेवा बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। इनमें भी जो सबसे खतरनाक है वह है साइलेंट हार्ट अटैक , जो पूरी तरह जानलेवा साबित हो सकता है।

कम उम्र में ही ना लक्षण वाले दिल के दौरे को चिकित्सकीय शब्दावली में असिम्टोमैटिक हार्ट अटैक कहा जाता है और इसे भारत में सालाना हृदय रोगों और यहां तक कि समय पूर्व मौत के लगभग 45-50 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार पाया गया है। एसएमआई का सामना करने वाले मध्यम आयु वर्ग के लोगों में ऐसी घटनाएं महिलाओं की तुलना में पुरुषों में दोगुना होने की आशंका होती है।

वास्तविक दिल के दौरे की तुलना में एसएमआई के लक्षण बहुत हल्के होते हैं, इसलिए इसे साइलेंट किलर कहा गया है। सामान्य दिल के दौरे में छाती में तेज दर्द, बाहों, गर्दन और जबड़े में तेज दर्द, अचानक सांस लेने में परेशानी, पसीना और चक्कर आना, जैसे लक्षण होते हैं जबकि इसके विपरीत एसएमआई के लक्षण बहुत कम होते और हल्के होते हैं और इसलिए इसे लेकर भ्रम हो जाता है और लोग इसे नियमित रूप से होने वाली परेशनी मानकर इसे अक्सर अनदेखा कर देते हैं ।

इसके जोखिम कारक आम दिल के दौरे के समान ही हैं। उसमें शामिल हैं: अधिक उम्र, पारिवारिक इतिहास, धूम्रपान या तंबाकू चबाना, उच्च रक्त चाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह, वजन संबंधित समस्या, शारीरिक गतिविधि की कमी। यदि 40 वर्ष से कम उम्र के किसी रोगी को श्वास लेने में परेशानी, छाती में दबाव, ठंडे पसीना आना जैसे लक्षण महसूस होते हैं, जो कि आम तौर पर हीटस्ट्रोक, अस्थमा या भावनात्मक चोट के लक्षण होते हैं, तो इसे कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए या गलत नहीं आंकना चाहिए। ऐसे मामले में किसी भी और जटिलताओं से बचने के लिए तत्काल निदान और चिकित्सकीय परामर्श अनिवार्य हो जाता है। अगर रोगी पहले से ही एसएमआई से पीडि़त है तो दिल के दौरे के कारण मृत्यु होने की संभावना दोगुना हो जाती है। कई अध्ययनों ने अनुमान लगाया है कि अत्यधिक तनाव और जीवनशैली में परिवर्तन के कारण, युवा पीढ़ी एरिथमिक पंपिंग, समयपूर्व हृदय रोगों जैसे कुछ बिना पहचान वाले हृदय रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील है; जिसकी परिणति अक्सर सडन कार्डियेक इवेंट के रूप में होती है।

हार्ट अटैक के अलावा सडन कार्डियक डेथ (एससीडी) के कारण

इन दोनों में अंतर है लेकिन ये दोनों हृदय रोग के समान रूप से खतरनाक कारण हैं जो 40 वर्ष से कम उम्र में ही पुरुषों और महिलाओं दोनों में दिल का दौरा पैदा कर सकते हैं।

हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी

यह एथलीटों सहित युवा लोगों में एससीडी का सबसे आम कारण है और अधिकतर मामलों में यह अनुवांशिक हो सकता है। यह हृदय की मांसपेशियों में आनुवंशिक उत्परिवर्तन के कारण होता है जो कार्डियक मांसपेशियों में वृद्धि करता है जिससे वेंट्रिकल्स की दीवारें मोटी हो जाती हैं। यह रक्त प्रवाह को बाधित करता है क्योंकि वेंट्रिकल्स पूरे शरीर में रक्त पंप करने के लिए उच्च दबाव के साथ काम करता है, जिससे व्यक्ति की शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है और उसे अचानक कोलैप्स हो सकता है।

मध्यम आयु वर्ग के लोगों (पुरुषों और महिलाओं दोनों) का धूम्रपान करना और शराब पर बढ़ती निर्भरता समय से पहले दिल की समस्याओं के लिए जिम्मेदार है। आराम तलब जीवनशैली, खाने की खराब आदतें और शारीरिक गतिविधि की कमी का मोटापे से संबंध है और इससे दिल की समस्याएं पैदा होती हैं।

कावासाकी रोग

 

यह बचपन के दौरान विकसित होने वाली सबसे दुर्लभ बीमारियों में से एक है, जिसमें धमनियों, नसों और केशिकाओं में सूजन हो जाती है। कुछ समय के बाद, यह बीमारी कोरोनरी धमनी को प्रभावित करती है जो ऑक्सीजन युक्त रक्त को दिल में ले जाती है। शुरुआती चरणों में इसका पता लगाना बहुत मुश्किल है और ज्यादातर मामलों में इसका निदान दिल के दौरे के बाद ही किया जाता है।

बुजुर्ग लोग दिल के दौरे से ज्यादा प्रभावित होते हैं, लेकिन इन दिनों प्रवृत्ति बदल रही है और युवा पीढ़ी में भी दिल से संबंधित ये बीमारियां बढ़ रही हैं।

साइलेंट हार्ट अटैक के लक्षण

इसके लक्षण सामान्य दिल के दौरे के समान हो सकते हैं और ये सामान्य लक्षणों की तरह ही हृदय की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और भविष्य में अटैक होने का खतरा बढ़ सकता है। निम्नलिखित लक्षणों को कभी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए — छाती, बाहों या जबड़े में हल्की असुविधा जो आराम करने के बाद ठीक हो जाती है, सांस लेने में तकलीफ  और बहुत जल्द थक जाना, नींद में परेशानी और अधिक थकावट, पेट दर्द या छाती में जलन, त्वचा में चिपचिपाहट। हृदय के स्वास्थ्य के लिए नियमित शारीरिक परीक्षण अनिवार्य है।

साइलेंट हार्ट अटैक के बाद उपचार

किसी भी रोगी को हमेशा एसएमआई से जुड़ी दो जटिलताओं – कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) और सडन कार्डियक डेथ (एससीडी) से अवगत होना चाहिए और सीएडी की गंभीरता के आधार पर संबंधित उपचार समय पर किया जाना चाहिए। उपचार का उद्देश्य दवाइयों, स्टेंट का उपयोग कर रिवैस्कुलराइजेशन और यहां तक कि बाईपास सर्जरी की मदद से इस्कीमिया, हार्ट फेल्योर और कार्डियेक एरीथमिया के कारण होने वाली मृत्यु को रोकना है। डॉक्टर स्टेस टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं, जिससे दो उद्देश्य हल हो सकते हैं। इससे डाक्टर को व्यायाम की सीमा को मापने में मदद मिलती है जो इस्कीमिया पैदा कर सकता है और डाक्टर सबसे सुरक्षित गतिविधियों से से संबंधित विशिष्ट निर्देश दे सकते हैं। दूसरा अगर स्ट्रेस टेस्ट के दौरान इस्कीमिया होता है तो व्यक्ति पहले से ही साइलेंट हार्ट अटैक से प्रभावित हो सकता है और वह खास प्रकार का एंजाइना का अनुभव करेगा और इस तरह यह परीखण एसएमआई से पीड़ित मरीजों के लिए महत्वपूर्ण फीडबैक दे सकता है और डाक्टर को बेहतर उपचार विकल्प अपनाने में मदद कर सकता है।

 

 

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