कमर के निचले हिस्से में दर्द है ?

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आर्थराइटिस ( गठिया)

आर्थराइटिस (संधिरोग) जोड़ों के सूजन की क्रोनिक (लम्बे समय से बनी हुई) स्थिति है. जोड़ वे स्थान हैं जहाँ दो हड्डियाँ आपस में मिलती हैं जैसेकि कोहनी का जोड़, घुटने का जोड़ आदि. उम्र बढ़ने के साथ ही लोगों को जोड़ों के दर्द की शिकायत परेशान करने लगती है। आर्थ बीमारी का नाम सुनते ही परेशानी होने लगती है कि कहीं मुझे भी यह बीमारी अपनी चपेट में न ले ले। आज हर पांच में से एक भारतीय इस बीमारी से परेशान है। आलम यह है कि बड़ों से लेकर छोटी उम्र के बच्चों में भी यह बीमारी पाई जा रही है।

 

क्या है आर्थराइटिस और कैसे हो सकता है इससे बचावः-

जोड़ों में सूजन और दर्द होने की स्थिति को आर्थराइटिस कहते हैं। प्रारम्भिक स्थिति में यह बीमारी जोड़ के थैले या कार्टिलेज को प्रभावित करता है। अगर इस पर ध्यान न दिया जाए तो यह बढ़ती जाती है और कार्टिलेज को प्रभावित करती है। ध्यान न देने से कार्टिलेज नष्ट हो जाती है और हडडी की बाहरी सतह खुलने लगती है,जो असहनीय पीड़ा का कारण बनती है।

कौन हो सकता है प्रभावित?

आम तौर पर यह समझा जाता है कि गठिया वृद्धावस्था की बीमारी है,लेकिन यह बीमारी वृद्धों से लेकर बच्चों तक में पाया जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह बीमारी नवजात शिशु में भी पाया जाता है,जिसे जुवेनाइल रूमैटाइड आर्थ्राइटिस कहा जाता है। युवावस्था में प्रारम्भ होने वाली आर्थराइटिस ज्यादातर रूमैटाइड या गाऊटी आर्थ्राइटिस होती है। 40 वर्ष की उम्र के बाद जोड़ों के दर्द को डीजेनरेटिव आर्थराइटिस या गठिया कहा जाता है।

सावधानी बरतने पर हो सकता है बचावः

आर्थराइटिस बीमारी के संकेत मिलते ही सावधानी बरतने से इस पर कुछ नियंत्रण पाया जा सकता है। 0 इस बीमारी से बचने के लिए खान-पान में ऐसे खाद्य पदार्थों का प्रयोग करें,जो आपको समुचित मात्रा में कैल्शियम के साथ कॉपर,मैगनीज और जिंक भी प्रदान करे। इन पोषक तत्वों को प्राप्त करने के लिए दूध, दही, पनीर, खजूर, हरी पत्तेदार सब्जियां, बादाम, मशरूम के अलावा समुद्री फूडस का सेवन कर सकते हैं। आर्थ्राइटिस की सूजन और कार्टिलेज के नुकसान को रोकने में लायप्रिनोल फूड सप्लीमेंट भी काफी लाभदायक साबित होते हैं। इस बीमारी के लक्षण दिखते ही डायबिटीज के रोगी बिशेष घ्यान दें औैर किसी भी प्रकार की दवा चिकित्सक की सलाह पर ही लें। जोडों के स्वास्थ्य के लिए नियमित व्यायाम आवश्यक है। सही शारीरिक स्थिति बनाए रखने के लिए किसी योग्य योगाचार्य की देखरेख में जोड़ों को सही बनाए रखने वाले व्यायाम करें। स्वस्थ्य जोड़ों के लिए शरीर का वजन सही होना चाहिए। मोटापे का शिकार होना जोडों की बीमारी को दावत देना है। बेहतर है मोआपे से बचें। तैराकी,साइकिलिंग,तेज चहलकदमी जैसी कसरतें जोड़ों की सेवत के बेहतर बनाए रखने में सहायक होती हैं। 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को हडिडयों का घनत्व जांचने के लिए परीक्षण कराना चाहिए,जिससे ऑस्टियोपोरोसिस की रोकथाम की जा सके,क्योंकि इसी मर्ज से हडिडयों से संबंधित समसया उत्पन्न होती है। दर्द व जोड़ों की समस्या से बचने के लिए दर्द निवारकों के अधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए, क्योंकि इनसे गुर्दे पर बुरा असर पड़ता है। जोड़ों की समस्या प्रारम्भ होते ही बिशेषज्ञ से सलाह लें।

जोड़ों की समस्या का समाधानः

जोड़ों की समस्या से निपटने में कृत्रिम जोड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कृत्रिम जोड़ों ने आर्थ्राइटिस के मरीजों को एक नया जीवन जीने की ललक और क्षमता प्रदान की है। कृत्रिम जोड़ों की नई खेप ने पुरानी भ्रांतियों को दूर कर दिया है। अब आधुनिक कृत्रिम जोड़ जिंदगी भर का साथ देते हैं, इन्हें हर 10 वर्ष पर बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। इनमें ऑक्सीनियम हिप व नी इंप्लांट, सेरेमिक ऑन सेरेमिक हिप इंप्लांट, मेटल ऑन सेरेमिक हिप इंप्लांट व अनसीमेंटेंड नी इंप्लांट बेहतर साबित हो रहे हैं।

आधुनिक परिप्रेक्ष्यः

आज के दौर में आर्थ्राइटिस को बीमारी न मानकर जिंदगी का एक हिस्सा मान लिया गया है। माना जा रहा है कि वृद्धावस्था में यह बीमारी आनी ही है। अब आर्थ्राइटिस के मरीज दर्द को सहने की बजाय अपने जोड़ों को बदलवाते हैं और लोगों से कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। एशिया पैसिफिक आर्थोप्लॉस्टी सोसायअी के अनुसार भारत में पिछले दस वर्षों में ज्वाइंट रिप्लेसमेंट बेहद सफल और लोकप्रिय हो रहे हैं।
प्रस्तुतिः अजेश कुमार,सीनियर जर्नलिस्ट
सीनियर आर्थोपेडिक सर्जन डॉ.बी.एस.राजपूत,ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल,मुंबई में कार्यरत से बातचीत पर आधारित

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