‘इस भरी दुनिया में कोई हमारा न हुआ’ समेत हिट गानों से भरपूर थी ‘भरोसा’

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‘इस भरी दुनिया में कोई हमारा न हुआ’ समेत हिट गानों से भरपूर थी ‘भरोसा’।भरोसा’ समेत कई पुरानी फिल्मों की यह समीक्षा एक ऐसी कलम से निकली हुई है, जिसने न केवल असल ज़िंदगी में बल्कि कल्पनाओं में भी कई शख्सियतों को बखूबी तराशा। इन्हें देखकर किसी के लिये भी अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल था कि इस दिल में इतनी कोमलता, इतनी गहरी भावनाएं और संवेदनाएं, मुहब्बत और नेकदिली छिपी हो सकती है। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनकी हर रचना कहती हैं कि एक बेहतरीन लेखक या कवि की कल्पनाओं का कोई आकाश नहीं होता। जब कलम चलती है तो सारी भावनाएं कोरे कागज़ पर खुद ब खुद उतरती चली जाती हैं।

इस भरी दुनिया में जैसे गानों से सजी ‘भरोसा’ फिल्म तीन बार बनी। पहली सोहराब मोदी अभिनीत 1945 में बनी स्लोमोशन फिल्म थी। दूसरी 1963 में रिलीज गुरुदत्त और आशा पारिख अभिनीत फिल्म थी। एक तीसरी बार भी बनी थी 1981 में, जिसमें राजेश खन्ना और वहीदा रहमान तथा सुजीत कुमार थे। लेकिन 1963 में रिलीज ‘भरोसा’ की कुछ बात ही और थी। बेशक यह फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट थी लेकिन जो फिल्म को हिट बनाने के लिए आवश्यक कारक होते हैं, वे इसमें सारे के सारे मौजूद थे। हीरो व हीरोइन के चेहरों में तरोताजगी और उस पर हिट से हिट गाने और संगीत का जादू हर कोई बरबस सिनेमाहाल की तरफ चल पड़ता था।

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इस भरी दुनिया में : मुहम्मद रफी

‘इस भरी दुनिया में कोई हमारा न हुआ’ या फिर ‘वो दिल कहां से लाऊं तेरी याद जो भुला दे’ ऐसे गीत हैं, ऐसे मेलोडीज़ हैं जो उन दशकों में जवां हुए दिल आज भी उसी शिद्दत से गाते हैं। मानों उनके जमाने अभी गुजरे नही, जस के तस खड़े हैं। फिर ‘आज की मुलाकात बस इतनी’ या ‘ये झुके झुके नैनां’ तो आज भी अक्सर रेडियो पर सुनने को मिल जाते हैं।

आज की मुलाकात बस इतनी : लता मंगेशकर, महेंद्र कपूर

यह फिल्म उस जमाने में खूब चर्चित थी। वैसे भी जिस फिल्म में कन्हैया लाल, नाना पल्सिकर, शोभा खोटे जैसे कलाकार हों तो समझो सीधी सारी कहानी में दरार आने वाली है, किसी का, भरोसा तो जरूर टूटेगा। इस फिल्म के ‘भरोसा तोड़ू’ भी कन्हैया लाल हैं। वह फिल्म में अमीर सेठ के विश्वासभक्त नौकर रौनक लाल बने हैं। सेठ को टीबी रोग हो जाता है और वह अस्पताल में दाखिल हो जाते हैं। चूंकि उस जमाने में टीबी एक लाइलाज रोग था, सो अपनी मृत्यु को नजदीक देखते हुए सेठ जी अपने इकलौते नन्हे बेटे बंसी को रौनक लाल के सुपुर्द करके उसे धन-दौलत से मालामाल करते हैं ताकि वह बंसी की परवरिश अच्छे ढंग से कर सके लेकिन रौनक लाल पैसों को लेकर गांव छोड़कर सपरिवार भाग जाता है। साथ में बंसी को भी ले जाता है।

धड़का ओ दिल धड़का : लता मंगेशकर, आशा भोंसले

दूसरे गांव में अपने बेटे की तो वह शहजादों की तरह परवरिश करता है, उसे उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजता है लेकिन बंसी (गुरुदत्त) से मजदूरों की तरह काम लेता है। उसे आरंभिक शिक्षा से भी महरूम रखता है जबकि बंसी रौनक लाल की खूब सेवा करता है। उसका अपना बेटा शहर जाकर शादी कर लेता और वहीं घर जंवाई बनकर रहता है।

वो दिल कहां से लाऊं : लता मंगेशकर

इधर गांव में बंसी ndhttp://indiamoods.com को दिल दे बैठता है। वे दोनों शादी करना चाहते हैं लेकिन रौनक लाल रुकावटें डालता है। अंत में न केवल बंसी और गोमती की शादी हो जाती है बल्कि टीवी ग्रस्त सेठ (जो अब ठीक हो चुका है) से रौनकलाल अपने गुनाह का इकरार कर लेता है। चूंकि ठीक होने पर सेठ निरंतर अपने बेटी की तलाश में था। उसे जब खोया बेटा मिलता है, उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। फिल्म में गांवके सीन बेहद सुंदर हैं। अधिकतर गीत आशा पारिख और गुरुदत्त द्वारा अभिनीत हैं। इसलिए भी यह वाली भरोसा दर्शकों के अधिक करीब है।

निर्माण टीम- प्रोडक्शन : एन. वासुदेवा मेनन, निर्देशन : के. शंकर, पटकथा : सुदर्शन बब्बर, गीतकार : राजेंद्र कृष्ण, संगीतकार : रवि , सितारे : गुरुदत्त, आशा पारिख, महमूद, नाना पल्सिकर, कन्हैया लाल, ओम प्रकाश, शोभा खोटे, ललिता पवार, सुदेश, सुब्बुलक्ष्मी आदि।