अंग्रेज़ी बोलते हैं, माना कि कुलीन हैं, थोड़ा सा प्रेम हिन्दी से भी करें…

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‍‍BY-Niroshaa Singh

अंग्रेज़ी बोलते हैं…? अंग्रेज़ी से प्यार शायद बचपन में ही हो गया था। ABCD सीखने के साथ ही। इसकी अहमियत तब और अधिक समझ में आ लगी जब पास-पड़ोस से लेकर , गली नुक्कड़, नाते रिश्तेदार, टीचर और बाबू सभी के मन में इसका मोह दिखने लगा। कि कैसे लाख अवव्ल दर्जे की HINDI बोलने वाला 4 टूटे -फूटे अंग्रेज़ी के वाक्य बोलने वाले के सामने बौना साबित किया जाता था।

सौ फीसदी सच है कि अब कोई किसी फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलने वाले से कतई प्रभावित नहीं होता जैसे पहले होता था। पिछले डेढ दशक में काफी कुछ बदला है। जहां अभिजात वर्ग की देखादेखी मध्यमवर्ग अंग्रेजी अपना रहा है, वहां सुपर-एलीट तबके में अंग्रेजी प्रेम घटा है और मातृभाषा के प्रति आकर्षण बढ़ा है।

हिन्दी को ज़िंदा करने , इसे जगाने की मुहिम छेड़ी है एक युवा मनीष गुप्ता ने….

हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं…

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए 
आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.

manish
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नसीरुद्दीन शाह आम की गुठली चूसते हुए ग़ालिब की बात करते हैं, मनोज बाजपेयी द्वारा रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी रचना ‘रश्मिरथी’ का ओजस्वी पाठ, स्वरा भास्कर पंजाब के क्रन्तिकारी कवि पाश को याद करती हैं, और सुरेखा सीकरी के होठों से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ फूट पड़ते हैं और आप मंत्रमुग्ध हो कर कविताओं के समुद्र में डूबते चले जाते हैं. समुद्र कहें या सालों की मेहनत से गढ़ा गया साहित्य का शालिमार बाग़ जिसकी बहारें ख़ूब से ख़ूबतर हुई जाती हैं.

Screen Shot 7
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अंग्रेज़ी बोलते हैं लेकिन भूले नहीं है हिन्दी भी….

भारत के अज़ीमोशान लोग – बिरजू महाराज, डागर बंधु, फ़िल्म डायरेक्टर इम्तिआज़ अली, सुधीर मिश्रा, अभिनेता मनोज बाजपेयी, स्वरा भास्कर, सुरेख सीकरी, पियूष मिश्रा, सौरव शुक्ला, रजत कपूर जैसी शख्सियतों का कविता पाठ आपका दिल जीत लेगा.

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सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग, पार्श्वसंगीत आपको पूरी तरह बांधे रखेगा और बार बार देखने के बाद भी आपका दिल न भरेगा यह दावा है ‘हिंदी कविता’ और ‘उर्दू स्टूडियो’ के दुनिया भर के करोड़ों चाहने वालों का. 

Screen Shot 1
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ये जादू कैसे हुआ, कैसे आज का यूथ साहित्य की ओर झुका ? इस बात पर मनीष हंसते हुए कहते हैं कि बड़ा आसान है, देश के सबसे अच्छे कवि, सबसे अच्छे प्रस्तुतकर्ता, सबसे बेहतर फिल्म मेकिंग के ज़रिये पेश किये जाएं तो कोई संदेह ही नहीं रहता कि लोगों को पसंद न आये. हिंदी भाषा ही नहीं अंग्रेजी बोलने, पढ़ने वाले लाखों लोग हिंदुस्तानी साहित्य में दिलचस्पी दिखाने लगे हैं. 

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं

hindi kavita 2
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‘मेरी कोशिश यह थी कि हिन्दोस्तानी का प्रयोग फैशन में आये. अंग्रेजी भाषा में अधिकतर लोगों की पढाई होती है और शायद रोज़गार भी. लेकिन अंग्रेज़ी इससे अधिक और कुछ नहीं है, जीने की भाषा आज भी हमारे लिए सबकी मातृभाषा ही है. हमारे गीत, फ़िल्में, टेलीविज़न, तीज-त्यौहार सभी तो माँ-बोली में ही हैं. हमारा सम्पूर्ण विकास उसी में संभव है. हमने देश के दिग्गजों से यह अपील की, सबने साथ दिया और इतिहास बन गया. 

अंग्रेज़ी बोलते हैं फिर भी सबसे ज्यादा हिन्दीभाषी भारत में

hindi varanmala
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भारत में आज भी हिंदीभाषी सबसे ज्यादा हैं। इतना बड़ा बाजार है, बस व्यापारिक अदूरदर्शिता की वजह से इसका दोहन नहीं किया जा रहा है। कोई साजिश नहीं है हिंदी के खिलाफ, अभी तक इस मार्केट को ठीक से दुहने का कुशल और बुद्धिमान प्रयास नहीं किया है।

Screen Shot 3
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शिक्षण संस्थाओं में हिंदी पढ़ने और पढ़ाने वालों को ‘ढीला’ समझा जाता है- छात्रों को रोजगार के अवसर नजर नहीं आते। उधर, पत्रकारगण बार-बार लिखते जा रहे हैं कि हिंदी के खिलाफ कोई साज़िश है शायद जिसके चलते हिंदी ‘लड़ाई’ हार रही है। मतलब ये कि सामूहिक सामाजिक चेतना में बार-बार ये बात अंकित होती है कि भाषाओं की इस ‘लड़ाई’ में हिंदी पिछड़ती जा रही है।

हॉलीवुड के गलियारों से देसी सांस्कृतिक घरौंदों तक 

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अमेरिका में सेटल होने के बाद भी एक बैचेनी हमेशा तबीयत में रवाँ रही थी. अपने देश में अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के प्रति गर्व कम है. नारे बहुत से हैं, पोस्टर्स खूब छपते हैं और नयी पीढ़ी को उलाहना भी बहुत दी जाती है कि ये अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं. लेकिन जब इस विषय पर कुछ करने की बात आती है तो सब हाथ झटक कर खड़े हो जाते हैं. सरकार बहुत कुछ करती है इस दिशा में लेकिन वह इस स्तर का होता है कि वह म्यूजियमों से बाहर ही नहीं आता.

Screen Shot 2
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अंग्रेज़ी बोलते हैं

रॉबर्ट डि नीरो की बेटी ड्रीना ने मेरी लिखी और निर्देशित फिल्म ‘कर्मा और होली’ प्रोड्यूस की थी जिसमें सुष्मिता सेन, रणदीप हूडा, सुचित्रा कृष्णमूर्ती के अलावा ड्रीना डि नीरो और सुपर मॉडल नाओमी कैम्पबेल भी रही हैं. उसके पहले की देसी डायस्पोरा की एक फ़ीचर फ़िल्म बनाई थी जिसका नाम ‘इंडियन फ़िश इन अमेरिकन वाटर्स’ था. वैसे अमेरिका जाना तो सॉफ्टवेयर में काम करने के बहाने हुआ था, मायामी में एक नाईट-क्लब भी चलाया हुआ है और एक सब कुछ छोड़ छाड़ कर न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी में एक दिन अचानक ही चला गया और इस एक कदम से ज़िन्दगी में एक नया आसमान ही खुल गया था. 

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भारतीयता में दिलचस्पी

बाद में मुंबई में टीवी सीरियल्स भी प्रोड्यूस किये लेकिन भारतीयता में दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी. कई विचार धीरे धीरे परेशान करने लगे थे कि हम अपनी माँ-बोलियों से भी दूर हो गए हैं. न अंग्रेजी ठीक से बोलनी आती है न हिंदी न पंजाबी. बस जैसे तैसे काम चल रहा है. हम न घर के रहे हैं न घाट के. मीडियोक्रिटी बढ़ती जा रही है हमारे लोगों में वगैरह वगैरह. 

manish
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फिल्म, टीवी, लेखन, पत्रकारिता और एडवरटाइज़िंग से जुड़े बहुत से लोगों के दिलों में भी ऐसे ही उद्गार घुमड़ते रहे थे. सबसे जुड़ कर बात हुई कि कुछ किया जाय और जैसे सब जगह होता है, बातें तो खूब होती हैं कि इस मुद्दे पर ये किया जाना चाहिए, वो किया जाना चाहिए लेकिन करे कौन? कौन अपनी चैन की बजती बंसी को दरकिनार करे? लेकिन मैंने इंतज़ार नहीं किया और अपने बूते पर ही काम करने का इरादा बनाया.

अकेले चलने पर धीरे धीरे कारवाँ बनता गया – पूरी तरक़्क़ी पसंद फिल्म इंडस्ट्री साथ आई परदे के पीछे और परदे के आगे भी. लेखकों के बहुत से वीडियो बना चुका था तब तक लोगों को पता था कि ईमानदारी से काम हो रहा है. सभी प्रतिष्ठिक लेखकों और सम्पादकों के मार्गदर्शन में ही काम हो रहा था, उन्हें आम इंसान के सामने लाना था, एक माहौल पैदा करना था देश में कि इस तरह का काम बढे. और क़िस्मत रही कि इस काम को अंजाम दे पाए. 

अंग्रेज़ी बोलते हैं लेकिन गुम हो रहे पंजाबी साहित्य के लिये तलाशनी है नयी सम्भावनाएँ 
amrita-pritam
amrita-pritam

मैं पूरी तरह आशावादी व्यक्ति हूँ. पंजाब का इतिहास गौरवमयी और समृद्ध रहा है. और भविष्य भी होगा. लेकिन सबसे पहले हमें यह मानना होगा कि आज की पीढ़ी भटक गयी है. सभी जानते हैं कि रैप और पॉप म्यूजिक ने पूरे ज़माने में चार बोतल वोदका उतार जाने को ही मर्दानगी बताया है. हथियारों का शो ऑफ और औरतों का ऑब्जेक्टिफिकेशन किस क़दर हुआ है. जब साहित्य और संस्कृति समाज से विलुप्त होते हैं तो निगेटिव ताकतें समाज में अपना घर बना लेती हैं. कोई इंस्टेंट इलाज नहीं है इस बात का आप यहाँ रैप बैन करेंगे तो वो कनाडा से बन कर इंटरनेट पर आ जाएगा. हमें अपनी ज़मीन मज़बूत करनी होगी जो धीरे धीरे ही होगा.

साहित्य को सांस्कृतिक चीज़ों का संरक्षण नहीं करना है उन्हें ‘कूल’ बनाना है. हमें इन्हें न कुचल कर अपनी लाइन बड़ी करनी है. हमारे हिंदी प्रॉजेक्ट में यही हुआ हिंदी साहित्य में इतनी सारी सेलेब्रिटीज़ ने हिस्सा लिया कि आज के युवा के लिए इन्हें ले कर काम करना फैशनेबल बना. इसी बात को हम पंजाब में भी दोहराना चाहेंगे – सभी तरह के लोगों को मिला कर, वर्ल्ड क्लास प्रेजेंटेशन से हम माहौल को बदल सकते हैं. 

“मुंबई फिल्म इंडस्ट्री हमारे काम की सबसे बड़ी प्रसंशक रही है. और हिन्दी पर काम करते करते न जाने कितने ही सेलेब्स ने कहा कि पंजाबी पर भी यह काम होना चाहिए. वैसे ही विदेशों से भी लगातार मैसेज आते रहे हैं कि काम हो तो ऐसा हो – सबको लगता रहा है कि इससे पंजाबी प्राइड ही नहीं बढ़ेगी, समाज को दिशा भी मिलेगी और साहित्य संस्कृति पर हर स्तर पर काम भी बढ़ेगा”

मनीष गुप्ता

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये