कहीं आपका बच्चा भी अकेलेपन का शिकार तो नहीं…

LONELY-KID
Little boy walking on train tracks

देर से बोलते हैं ऐसे बच्चे जो ज्यादातर समय अकेले रहते हैं। आज के समय में बहुत से पेरेंटस की शिकायत रहती है कि बच्चा 5 साल का हो गया या 6 साल का हो गया लेकिन बोलता नहीं है। यह ज़रूरी नहीं है कि यह समस्या मेडिकल से जुड़ी हो, दरअसल न्यूक्लियर फैमिली यानी एकाकी परिवारों में रहने वाले बहुुत सारे बच्चे देर से बोलते हैं। कभी-कभी एक समय था जब संयुक्त परिवार हुआ करते थे । तब परिवार में माता-पिता और दादा-दादी के अलावा, चाचा-चाची, ताऊ और पड़ोसी एक साथ रहते थे और उनके बच्चे बड़े होते थे। बच्चा चाहे वह किसी का भी हो, घर का हर सदस्य अगर उससे बात करता है, खेलता और उसके साथ वक्त बिताता है तो छोेटे बच्चे जल्दी बोलने लग जाते थे तथा दो वर्ष का होते होते वह बोलने में समर्थ हो जाते हैं।

देर से बोलते हैं न्यूक्लियर फैमिली के कारण

lonely child

आज संयुक्त परिवार (Joint family) की बजाय nuclear family का कल्चर है। पति-पत्नी दोनों ही वर्किंग हैं तो समस्या और विकराल हो जाती है । आया के भरोसे बच्चे छोड़कर जाते हैं या फिर क्रेच में उनकी व्यवस्था कर देते हैं। ऐसे में उनके साथ दिनभर न तो कोई वक्त बिताने वाला होता है, न ही बोलने वाला और सिखाने वाला कोई होता है। पेरेंटस बहुत कम समय तक ही बच्चे के साथ रह पाते हैं । दोनों ही अपने काम से थके हारे आते हैं तो घर के कामकाज में बिज़ी हो जाते हैं ऐसे में वे अपने बच्चें के साथ बातें कब करें? नतीजा यह होता है कि बच्चा देर से बोलता है। कम बोलता है या बहुत अधिक। खैर यह साईंटिफिकली या मेडिकली प्रमाणित नहीं है लेकिन न्यूक्लियर परिवारों और सिंगल पेरेंटिंग के केस में भी ऐसे मामले आस-पास देखने को मिल भी जाते हैं।

मोबाइल भी ज़िम्मेदार

child lonely

देर से बोलते हैं बच्चे तो इसका एक कारण न्यूक्लियर फैमिली है दूसरा है बचपन पर पड़ रही मोबाइल की मार। वर्कलोड की बात अलग है जबकि सोशल मीडिया जैसी चीजों के कारण भी मां-बाप बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं। संयुक्त परिवारों में दादा-दादी से मिलने वाले भरपूर प्यार दुलार से बचपन वंचित रह गया है। हमारे आस-पास तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके बच्चे तीन-चार साल की उम्र में भी नहीं बोल पा रहे हैं । उन्हें मामा, पापा या दादी-दादा जैसे शब्द तक बोलने में परेशानी आ रही है। तो अब अभिभावक क्या करें? ज़ाहिर है कि वे थैरेपिस्ट के पास जा रहे हैं।

क्रेच और डे केयर का सहारा

घर पर आया रख नहीं सकते इसलिये वर्कप्लेस पर या डे केयर में बच्चों को अपनत्व नहीं मिल पाता। इसके अलावा, जब बच्चा माता- पिता के साथ होता है तो तब भी उससे बात करने के बजाय माता-पिता उसे मोबाइल थमा दे रहे हैं कि बच्चा मोबाइल में व्यस्त रहेगा और वह अपना काम कर सकेंगे। इसके अलावा, मां-बाप खुद भी सोशल मीडिया आदि में अपना समय खपा देते हैं ।

डीईआईसी में ऐसे बच्चों का उपचार थैरेपी के माध्यम से करते हैं। अगर बच्चे में बोलने में देरी होगी तो भविष्य में उसमें आत्मविश्वास की कमी आएगी और हीन भावना पनपने लगेगी। इसलिए ज़रूरी है कि समय रहते ही उपचार कराएं ।

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