ब्रेस्ट हटने के बाद उसने पूछा- तुम्हें मेरे शरीर में कोई कमी लगती है ?

cancer survivor
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This emotional story has been taken from News 18. Readers are urged to read it completely (साभार)

ब्रेस्ट हटने के बाद कैंसर पेशेंट कैसी दिखती हैं? लोग कैंसर के मरीज या उसकी देखभाल करने वालों से खूब कहानियां सुनना चाहते हैं. उनके तरीके की कहानियां. उम्मीदों से जगमग. इरादों में मजबूत. कोई भी मरते हुए चेहरों, डूबती उम्मीदों और पस्त पड़ते हौसलों की बात नहीं सुनता.

उसने ब्रेस्ट कैंसर की खबर मुझे फोन पर दी. ठहरे हुए अंदाज में- जैसे कोई रुटीन बात हो. उस वाकये को 5 साल बीते. उर्वि अब सेहतमंद है. उतनी ही ताजा और खुशरंग, जितनी कोई भी जिंदादिल औरत हो सकती है. बहुत बहादुरी से लड़ी. शरीर के तमाम जख्मों से. भीतर जाती जहरीली दवाओं से. चीर देने वाले रेडिएशन से.

ये कहानी है अहमदाबाद की ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर उर्वि के पति राजेश सबनीस की. जो कहते हैं- वो जीती. उसके साथ-साथ मैं भी जीता. अब मुझे गूगल का इस्तेमाल, काढ़े बनाना और ड्रेसिंग बखूबी आती है.

साल 2015 की जनवरी. मैं मीटिंग के सिलसिले में बाहर था. काफी लंबे दिन के बाद क्लाइंट के साथ डिनर का प्लान था. मैं कमरे में पहुंचा. बालकनी से नदी दिख रही थी. तभी फोन बजा. ये उर्वि थी. मेरी पत्नी. वो बहुत संभली हुई आवाज में बात कर रही थी. ठहरे हुए अंदाज में ही उसने अपने कैंसर की बात बताई. जैसे कोई रुटीन खबर बताता है. उसे डर था कि मैं घबरा जाऊंगा. कुछ पल उसकी बात को जज्ब करने में लगे लेकिन फिर मैं एकदम मशीनी हो गया. क्या करना है? कैसे करना है? गुजरात में ब्रेस्ट कैंसर के लिए अच्छे डॉक्टर कौन से हैं?

हमने सारी बातें कीं और मैंने ये कहते हुए फोन रखा कि तुम अभी सो जाओ. सुबह मैं पहुंच रहा हूं. अगली सुबह नॉर्मल नहीं थी. रिजोर्ट के पास बहती नदी का किनारा कल तक मुझे अपने देसीपन में भा रहा था लेकिन उस सुबह मैंने खिड़कियों के पर्दे भी नहीं हटाए. किसी भी चीज में ‘मज़ा’ नहीं आ रहा था. मैंने सारी मीटिंग्स कैंसल कीं और घर के लिए निकल गया. देश के उस हिस्से से कनेक्टिविटी कम थी. आने में जितनी देर लगी, मैं एक ही चीज गूगल करता रहा- ब्रेस्ट कैंसर. http://www.indiamoods.com/irfaan-khan-wins-fight-from-cancer-returns-to-india/

Cancer-Survivors
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इस बार घर के भीतर घुसते हुए मन में धुकधुकी लगी थी. उर्वि को कभी भी हौसला खोते नहीं देखा था. वो उर्वि क्या रो पड़ेगी? रोएगी तो क्या मैं संभाल सकूंगा? राजेश बताते हुए फोन पर हंसते हैं- मैं तसल्ली देने या प्यार जताने में बड़ा कच्चा हूं. डर लग रहा था कि हालात कैसे संभालूंगा. लेकिन उर्वि ने ही मुझे संभाल लिया. वो उतनी ही खुशदिली से मिली जैसे हर बार मेरे लौटने पर मिला करती.
इसके बाद शुरू हुआ अस्पताल का चक्कर. उर्वि के नाम की फाइल बनी, जिसके कवर पर एक मुस्कुराती तस्वीर थी. जितनी उर्वि कमजोर हो रही थी, फाइल दिन-ब-दिन उतनी ही तंदुरुस्त हो रही थी. 

ब्रेस्ट हटने के बाद ऐसी थी हालत

urvi
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उसी महीने के आखिर में सर्जरी हुई और उसका लेफ्ट ब्रेस्ट निकाल दिया गया. बिस्तर पर आंखें मूंदे उर्वि पट्टियां पहने हुए थी. हाथ में अस्पताल का बैंड. जिसपर उसका नाम और पेशेंट नंबर लिखा था. सीने पर पट्टियां ही पट्टियां. अस्पताल के नाम के साथ कितने ही स्टार चमक रहे हों, वहां का फर्श कितना ही लकदक हो- वहां की महक आपको तोड़ देती है. वो हर पल आपको बीमार होने की याद दिलाती है. और बीमारी भी क्या! ब्रेस्ट कैंसर.

लौटने के बाद उर्वि का पहला सवाल था- क्या मेरे शरीर में कोई कमी लगती है? मजबूत इरादों वाली वो औरत टुकुर-टुकुर मुझे देख रही थी. मैंने जवाबी सवाल पूछा- मेरा हाथ न रहे तो क्या मैं तुम्हें पूरा नहीं लगूंगा! वो मुस्कुराती हुई चली गई.

मैं नर्स को देख रहा था. उसके हाथों की हरेक मूवमेंट. हल्की से हल्की हरकत. कैसे वो घाव खोलती है. कैसे साफ करती, कैसे पोंछती है. पट्टियां कैसे बांधी जाएं कि न खुलें, न सख्त लगें.

ब्रेस्ट हटने के बाद खुद करता रहा सर्जरी

अगली रोज से पूरे महीनेभर में उर्वि की ड्रेसिंग करता रहा. ब्रेस्ट की सर्जरी के बाद रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी भी हुई थी. रोज सुबह घाव खोलता तो जख्म दिखते. सीने पर. पेट पर. गहरे-गहरे जख्मों से कभी खून आता, कभी मांस की लोथ झांकती. मैं सिहर जाता. तब बड़ा ही असहाय महसूस करता था.

सर्जरी के बाद की लड़ाई असल लड़ाई थी. कीमोथैरेपी के बारे में मैंने भी सुना, उसने भी. उसने अपनी तरह से तैयारी शुरू की. बाल शेव करवा लिए ताकि गुच्छों में झड़ने का डर न रहे. मैंने अपनी तरह से तैयारियां की. खूब पढ़ा. डॉक्टरों से मिला. साइड इफेक्टस पर बात की. लेकिन सारी तैयारियां धरी की धरी रह गईं.

कैंसर सुनने में जितना खौफनाक लगता है, उससे कहीं ज्यादा तकलीफ कीमो के दौरान होती है. 6 साइकिल चलीं. इस दौरान उर्वि का वजन एकदम कम हो गया. आंखों के नीचे स्याह धब्बे दिखने लगे. हर वक्त उल्टियां होतीं और जब उल्टियां रुकतीं तो जी मिचलाता. बुखार शरीर का असल तापमान बन गया था. उसके करीने से तराशे नाखून काले पड़ गए थे. राजेश याद करते हैं- तब भी उर्वि रोई नहीं. हमेशा उसी ताजा अंदाज में बात करती. चार कीमो हो चुकी थी. मैं सिर्फ गिनतियां किया करता. और गूगल.

पांचवी कीमो तोड़ने वाली रही. मैं देश से बाहर था. टूर ऐसे प्लान्ड था कि कीमो से पहली ही रात लौट सकूं. मीटिंग थोड़ी लंबी खिंच गई. होटल से भागा लेकिन तमाम दौड़-भाग के बावजूद फ्लाइट मिस हो गई. अगली फ्लाइट कई घंटों बाद थी. कीमो शुरू होने से पहले मैं अस्पताल नहीं पहुंच सकता था. दोस्तों को कॉल करना शुरू किया. एक-दो-तीन… अहमदाबाद के तमाम करीबी दोस्त अगली रोज उर्वि के साथ थे. मैं दोपहर तक अस्पताल पहुंचा. अपने काम को लेकर पैशनेट हूं. घंटों, दिनों बिना रुके काम की बात कर सकता हूं. वो पहली बार था, जब अपने काम को मैंने कोसा. काम की ही वजह से कीमो से पहली रात मैं उर्वि के पास नहीं था.

ब्रेस्ट हटने के बाद ही नहीं पहले भी दर्द में थीं उर्वि

इसी कीमो में उर्वि को काफी तकलीफ हुई. घर लौटने के बाद वो बेतहाशा दर्द में रही. उल्टियां करते हुए लगता था अंतड़ियां बाहर निकल आएंगी. न दर्द कम हो, न उल्टियां. तब पहली ही बार उसने खुद से डॉक्टर के पास जाने को कहा. तब समझ में आया कि हिम्मतवाली ये औरत कितनी तकलीफ से गुजर रही होगी. व्हीलचेयर से कार में बैठ रही उर्वि एकदम असहाय दिख रही थी. लौटने के बाद उसने बताया, जैसे कोई राज कह रही हो- अस्पताल जाते हुए मुझे लगा था कि मैं वापस नहीं लौट सकूंगी. आंखों में आंसूभरी चमक लिए मुस्कुराती उर्वि को मैं मानो पहली बार देख रहा था.

कैंसर जैसी बीमारी आपको ‘औकात’ बता देती है. कितने ही पैसे हों, सामने डॉक्टर लाइन लगाकर खड़े हों लेकिन दर्द कोई कम नहीं कर सकता.

सर्जरी के बाद वो उर्वि का पहला जन्मदिन था. वैसे तो मैं एकदम कमजोर पार्टी ऑर्गेनाइजर हूं लेकिन तब मैंने खूब मेहनत की. कई-कई दिनों तक लिस्ट तैयार की. इसमें उर्वि के सारे करीबी दोस्त और वे लोग शामिल थे, जिनका होना उसके लिए मायने रखता था. लिस्ट की काट-छांट की. डेकोरेशन का डिजाइन देखा. उर्वि के लिए खरीदारी की. उसे एकदम गुड़िया की तरह तैयार किया. तब पार्टी में लेकर आया. वो पार्टी ग्रांड सक्सेस रही. आज भी जब वो एलबम देखता हूं तो उर्वि की आंखों की चमक में मुझे पार्टी की कामयाबी दिखती है. वो बेइंतहां खुश थी. कीमो के बावजूद उस एक दिन वो खुलकर हंसी, खाई और देर रात जागी. दर्द की वजह से नहीं, खुशी के चलते.

कैंसर दरअसल यही है. जब आता है तो मरीज के साथ उसके पूरे परिवार पर काबिज हो जाता है. मरीज लड़ाई हार जाए तो भी परिवार के साथ छाया की तरह साथ रहता है. उर्वि कैंसर से जीत तो गई लेकिन उसे अगले 10 सालों तक दवाएं खानी हैं. बिना भूले. जब लोग हमसे पूछते हैं, इलाज कब पूरा होगा. हम हंस देते हैं. कभी-कभी कहना चाहते हैं- जब उम्र पूरी होगी.